De-dollarisation Myth Law and India's Role

De-dollarisation: Myth, Law, and India's Role

De-dollarisation: Myth, Law, and India's Role

 डी-डॉलराइजेशन की बहस एक बार फिर तेज

ब्रिक्स देश अंतरराष्ट्रीय कारोबार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। भुगतान के वैकल्पिक रास्ते तलाशे जा रहे हैं। मकसद किसी एक मुद्रा पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता कम करना है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ब्रिक्स देश अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर को पूरी तरह किनारे कर सकते हैं? क्या ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ होगा? और इस पूरी बहस में भारत की स्थिति क्या है?

दरअसल, डी-डॉलराइजेशन की बहस को अक्सर अमेरिका बनाम उभरती वैश्विक शक्तियों की लड़ाई के तौर पर देखा जाता है। लेकिन इसके पीछे एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सवाल भी है। क्या अंतरराष्ट्रीय कानून दुनिया के देशों को किसी खास मुद्रा में कारोबार करने के लिए बाध्य करता है? इसका सीधा जवाब है- नहीं।

 

डॉलर अनिवार्य नहीं

दुनिया की मौद्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के नियमों से जुड़ा है। इन नियमों की नींव 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के दौरान रखी गई थी। आईएमएफ व्यवस्था का उद्देश्य देशों के बीच मौद्रिक सहयोग बढ़ाना, अंतरराष्ट्रीय भुगतान को आसान बनाना और विनिमय दरों में स्थिरता बनाए रखना था।

लेकिन इन नियमों में कहीं यह नहीं कहा गया कि दुनिया के देशों को अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए अमेरिकी डॉलर का ही इस्तेमाल करना होगा। यानी डॉलर को दुनिया की प्रमुख आरक्षित और कारोबार की मुद्रा बनाने वाला कोई स्थायी अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रावधान नहीं है।

 

डॉलर इतना ताकतवर कैसे बना?

इसका कारण कानून से ज्यादा अमेरिकी अर्थव्यवस्था की ताकत है। अमेरिका के विशाल वित्तीय बाजार, डॉलर में उपलब्ध बड़ी मात्रा में संपत्तियां, संस्थागत भरोसा और वैश्विक व्यापार में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की भूमिका ने डॉलर को दुनिया की प्रमुख मुद्रा बना दिया।

आईएमएफ के नियमों में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक आर्टिकल-4 है। इसके तहत आईएमएफ के सदस्य देशों को मौद्रिक सहयोग और विनिमय दरों में स्थिरता बनाए रखने की दिशा में काम करना होता है। यानी आईएमएफ किसी देश से यह नहीं कहता कि वह अपना अंतरराष्ट्रीय कारोबार डॉलर में ही करे। वह यह भी नहीं कहता कि किसी देश को अपनी विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर रखना ही होगा।

 

दो देश अपनी मुद्रा में कारोबार कर सकते हैं?

 

इसका जवाब हां है। अंतरराष्ट्रीय कानून देशों को अपने द्विपक्षीय व्यापार में इस्तेमाल होने वाली मुद्रा चुनने की काफी गुंजाइश देता है। अगर दो संप्रभु देश आपसी सहमति से डॉलर की जगह अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार करना चाहते हैं तो केवल ऐसा करने से वे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं करते।

यही बात ब्रिक्स की स्थानीय मुद्रा में कारोबार बढ़ाने की कोशिशों पर भी लागू होती है। अगर ब्रिक्स देश रुपये, रूबल, युआन या दूसरी राष्ट्रीय मुद्राओं में आपसी कारोबार का रास्ता बनाते हैं तो इसे अपने आप अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था के खिलाफ कानूनी कदम नहीं माना जा सकता।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बात?

भारत पिछले कुछ वर्षों से रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। कई देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार निपटाने के विकल्प तलाशे गए हैं। इसका फायदा यह हो सकता है कि हर अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए डॉलर पर निर्भरता कम हो। इससे विदेशी मुद्रा की जरूरत घट सकती है और भारत को अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ भुगतान व्यवस्था में ज्यादा विकल्प मिल सकते हैं। भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और कानूनी स्थिति

ब्रिक्स देशों के बीच वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था बनाने की कोशिशों को लेकर भी काफी चर्चा है। इसका उद्देश्य यह है कि अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए हर बार अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता न रहे। लेकिन यहां भी कानूनी स्थिति साफ है। वैकल्पिक भुगतान तंत्र बनाना अपने आप में आईएमएफ व्यवस्था के खिलाफ नहीं है।

इसी तरह राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार करना भी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं है, जब तक संबंधित देश अपनी दूसरी अंतरराष्ट्रीय संधियों और दायित्वों का पालन करते हैं। इसलिए डॉलर को चुनौती देना और अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ना दो अलग-अलग बातें हैं।

ये सवाल ज्यादा अहम

दुनिया के देश किस मुद्रा में व्यापार करना चाहते हैं? किस मुद्रा में निवेश करना चाहते हैं? किस मुद्रा की वित्तीय बाजारों में पर्याप्त तरलता है? किस देश की अर्थव्यवस्था और संस्थाओं पर उन्हें भरोसा है? ये सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे।

ब्रिक्स अगर स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाता है तो इससे डॉलर की भूमिका कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है। लेकिन डॉलर की वैश्विक स्थिति को बदलना सिर्फ वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था बनाने से संभव नहीं होगा। इसके लिए बड़े और गहरे वित्तीय बाजार, स्थिर अर्थव्यवस्था, भरोसेमंद संस्थान और व्यापक अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी जरूरी होगी।

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